आज हमारे देश में एक ऐसा दौर है जहाँ एक पार्टी का ऐसा मानना है कि वोह जो कहे सिर्फ वही सही और कोई सही नहीं हो सकता।
अभी ताज़ा प्रकरण अध्यादेश को लेकर है राहुल जी ने सार्वजनिक तौर पर उसका विरोध कर दिया तो वोह असंवैधानिक हो गया, लोकतंत्र के खिलाफ हो गया, प्रधानमंत्री का अपमान हो गया, अगर अध्यादेश लागु हो जाता तो कांग्रेस पार्टी दागियों को बचा रही है अब अगर अध्यादेश वापस हो गया तो भी उनके पेट में दर्द हो रहा है कि हाथ आया हुआ मुद्दा रेत की तरह हाथ से निकल गया।
सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री जी को देहाती औरत कहने से उनका अपमान नहीं होता ??
मौनमोहन कहने से अपमान नहीं होता ???
जातिगत टिपण्णी (सरदार है पर असरदार नहीं) करने से अपमान नहीं होता ??
अध्यादेश को बकवास कहने से प्रधानमंत्री का अपमान हो जाता है, PM की पगड़ी उछल जाती है।
क्या किसी ने देखा पगड़ी उछलते हुए ???
ख़ैर किसी ने देखा हो या नहीं लेकिन मैंने तो नहीं देखा।
दूसरा वाक्या यह है की १२ अक्टूबर २०१२ को केंद्रीय ग्रामीण और विकास मंत्री ने कहा था की देश में शौचालय से जादा मंदिर हैं (मेरा मकसद किसी की भी कोई भावना को ठेस पहुचना नहीं है अगर कोई आहत होता है तो क्षमा करें) तो उस पार्टी (B.J.P. ) का कहना था कि इससे धार्मिक भावना को ठेंस पहुची है,
लेकिन यही बात अब उनके दहाड़ू नेता ने बोली है तो वोह गलत नहीं हो सकती क्युकी वोह तो कुछ गलत बोल ही नहीं सकते, बेशक इस बात को कहने में शब्दों का बहुत फर्क है लेकिन बात एक ही है।।।
गलत तो शहज़ादे मेरा मतलब सहजादे बोलते हैं लोकतान्त्रिक लोग नहीं।।
माफ़ कीजिये दोस्तों अगर जरी रखुगा तो आप लोग मुझे पकाऊ बोलेगे इसलिए इतने में ही सोचिये की कौन सच्चा और कौन झूठा ??
दोस्तों पहली बार लिखा है इसलिए कुछ गलतियाँ हो सकती हैं नज़रंदाज़ कर देना।
चलता हूँ।
ज़ीशान अली !!
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